Thursday, November 15, 2018


Gall Bladder Stone, can be treated in Homeopathy with some conditions 

Gallstones (choleliths) are crystalline bodies formed within the body by accretion or concretion of normal or abnormal bile components.
Gallstones can occur anywhere within the biliary tree, including the gallbladder and the common bile duct. Obstruction of the common bile duct is choledocholithiasis;

Size

A gallstone's size varies and may be as small as a sand grain or as large as a golf ball. The gallbladder may develop a single, often large stone or many smaller ones. They may occur in any part of the biliary system.

Causes

Researchers believe that gallstones may be caused by a combination of factors, including inherited body chemistry, body weight, gallbladder motility (movement), and perhaps diet.

Symptoms

Gallstones usually remain asymptomatic initially. They start developing symptoms once the stones reach a certain size (>8 mm). A main symptom of gallstones is commonly referred to as a gallstone "attack", also known as biliary colic, in which a person will experience intense pain in the upper abdominal region that steadily increases for approximately thirty minutes to several hours. A patient may also experience pain in the back, ordinarily between the shoulder blades, or pain under the right shoulder. Nausea and vomiting may occur
These attacks are sharp and intensely painful, similar to that of a kidney stone attack. Often, attacks occur after a particularly fatty meal and almost always happen at night. Other symptoms include abdominal bloating, intolerance of fatty foods, belching, gas, and indigestion..
Some people who have gallstones are asymptomatic and do not feel any pain or discomfort. These gallstones are called "silent stones" and do not affect the gallbladder or other internal organs.

Treatment

Surgical options

Cholecystectomy (gallbladder removal) has a 99% chance of eliminating the recurrence of cholelithiasis. Only symptomatic patients must be indicated to surgery. The lack of a gall bladder , however in a significant proportion of the population - between 5-40% - develop a condition called postcholecystectomy syndrome which may cause gastrointestinal distress and persistent pain in the upper right abdomen. In addition, as many as 20% of patients develop chronic diarrhea.

Homeopathic Treatment

Gall Bladder stones can be effectively dissolved with Homeopathic medicines.Results are better if the treatment is started at an early stage soon after the diagnosis is confirmed. Homeopathic treatment can be a boon to patients who are at high risk surgery such as Aged ones, Hypertensive and Diabetics. Some food restrictions go side by side.

Saturday, August 4, 2018

लिवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis)



लिवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis)

लिवर सिरोसिस लिवर का एक जटिल रोग है, जिसमें लिवर की क्रियाशील कोशिकाओं का क्षय होता रहता है तथा उनका स्थान तंतुमय ऊतक ले लेते हैं, जिसके कारण इससे प्रवाहित होने वाला रक्त बाधित हो जाता है तथा लिवर की क्रियाशीलता शनैः शनैः कम होती चली जाती है।
                लिवर शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है जिसका वजन सामान्यतः 1.5 कि० ग्रा० होता है। यह पेट में दायीं ओर होती है तथा इसका मुख्य कार्य शरीर में विभिन्न उपाचय क्रियाओं द्वारा उत्पन्न विषाक्त पदार्थों को निष्क्रिय करना है। यह रक्त को शरीर में जमने से बचाने वाले पदार्थ हिपेरिन का संष्लेशण तो करता ही है साथ ही रक्त वाहिनियों के टूट फूट जाने पर रक्त का थक्का जमाने में प्रयुक्त होने वाले रसायन का भी संष्लेशण करता है, यह कई प्रकार के विटामिनों का संष्लेशण भी करता है, बाइल (पित्त रस) का संष्लेशण करता है जिससे वसा का पाचन संभव हो पाता है।
लिवर सिरोसिस के कारणः- लिवर सिरोसिस के कई कारण हो सकते हैं जिनमें से शराब का अत्यधिक एवं दीर्घ कालिक सेवन, हिपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, हीपेटाइटिस डी, आटो इम्यून हेपेटाइटिस, कुछ वंशानुगत रोग, नान एल्कोहालिक इस्टीएटो हेपेटाइटिस (Steatohepatitis), पित्त नलिका का अवरूद्ध होना, विभिन्न प्रकार की औषधियाँ एवं संक्रमण।
लक्षणः- सामान्यतः आरम्भिक अवस्था में कोई लक्षण नहीं पाये जाते परन्तु ज्यों-ज्यों लिवर की क्रियाशीलता कम होती जाती है रोगी कई लक्षण महसूस करता है जैसे- जल्दी थक जाना, भूख लगना, जी मिचलाना, कमजोरी, वजन कम होना, पेट में दर्द, त्वचा पर रक्त वाहिनियों के मकड़ी जैसे चकत्ते (Spider Hamengiomas), जलोदर (Ascites), तिल्ली बढ़ना, पीलिया आदि। साथ ही इस रोग से भविष्य में कई जटिलतायें उत्पन्न हो सकती हैं जिनमें से कई जानलेवा हो सकती हैं।
निदानः- लिवर सिरोसिस के निदान के लिये रक्त परीक्षण, क्लीनिकल लक्षण, अल्ट्रासाउण्ड, सी० टी० स्कैन आदि का सहयोग लिया जा सकता है परन्तु लिवर की बायोप्सी को ही ठोस प्रमाण माना जाता है।
इलाजः- आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इस रोग के फलस्वरूप उत्पन्न जटिलताओं से बचाव पर ही पूरी चिकित्सा केन्दि्रत होती है एवं गंभीर अवस्था में लिवर का प्रत्यारोपण ही एकमात्र विकल्प है।
होम्योपैथिक चिकित्साः- सामान्यतः लिवर को हुई क्षति की पूर्ति पूर्ण रूप से होना असंभव है परन्तु होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में लिवर के लिये कई प्रभावी औषधियाँ उपलब्ध हैं। लिवर शरीर का एकमात्र ऐसा अंग है जिसमें रिजनरेशन (Regeneration) की क्षमता है। यदि लिवर का कुछ अंश स्वस्थ एवं जीवित है तो अनुकूल परिस्थितियों में पुनः अपनी कार्य क्षमता बढ़ा सकता है तथा रोगी का जीवन स्तर सुधर सकता है। अन्य चिकित्सा पद्धतियों में रोगी को जो भी औषधि दी जाती है उसमें कुछ कुछ विषाक्तता होती है जिसे लिवर को ही निष्क्रिय करना होता है परन्तु स्वयं लिवर के रोग-ग्रस्त होने पर यह उस पर एक अवांछित बोझ है। होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में लिवर सिरोसिस के लिये दी जाने वाली दवाओं में औषधि की मात्रा अत्याधिक सूक्ष्म होती है अतः किसी प्रकार की विषाक्तता का प्रश्न ही नहीं उठता अतः किसी कुशल होम्योपैथिक चिकित्सक से परामर्श कर चिकित्सा ली जाये तथा चिकित्सक के निर्देशानुसार खान-पान में परहेज किया जाये तो इस रोग में आशातीत परिणाम मिल सकता है।
इस रोग में मुख्य लाभकारी औषधियाँ इस प्रकार हैं- केल्केरिया-आर्स, आर्से निक एल्बम, कार्डुअस, चायना, चेलिडोनियम, हाइड्रास्टिस, फास्फोरस, माईरेका, सल्फर, लाइकोपोडियम, एपिस-मेल, मैग-म्यूर आदि।
उपरोक्त औषधियों का सेवन किसी कुशल होम्योपैथिक चिकित्सक के परामर्श से ही करना चाहिये।
सुझावः- शराब का सेवन करें, हेपेटाइटिस का टीकाकरण करायें, वसा का सेवन कम करें, साफ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करें, अनावश्यक बिना चिकित्सकीय परामर्श के दवा लें.

Saturday, July 21, 2018

एलर्जी


एलर्जी




जब शरीर का रोग प्रतिरोधक तंत्र (Immune System) किसी वस्तु के विरूद्ध अतिसंवेदनशीलता (Hypersenstivity) दर्शाते हुए उग्र प्रतिक्रिया करता है तो उसे सामान्य भाषा में एलर्जी कहते हैं।नैनो इंडिया होम्योपैथी के चिकित्सको के अनुसार आजकल बढ़ते प्रदूषण (जैसे धुआँ, धूल परागकण, सुगन्धित पदार्थ इत्यादि), व्यस्त जीवनशैली अनियमित खान-पान के कारण एलर्जी ग्रस्त रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। यदि शरीर का रोग प्रतिरोधक तन्त्र सामान्य से कम सक्रिय होता है, तो व्यक्ति किसी भी संक्रमण की चपेट में सकता है, इसके विपरीत जब यह तन्त्र सामान्य से अधिक सक्रिय होता है, तो यह एलर्जी को जन्म देता है। जब रोगी एलर्जी कारक के सम्पर्क में आता है तो उसका रोग प्रतिरोधक तन्त्र सक्रिय होकर विशेष प्रकार के एन्टीबाडी (Antibodies) बनाता है, जो मास्ट कोशिका से जुड़ कर विशेष प्रकार के रसायन स्रावित करते हैं। जिसके कारण रोगी के शरीर पर विभिन्न प्रकार के लक्षण रोग के रूप में उभरते हैं। जैसे त्वचा पर लाल चकत्ते उभरना, सांस फूलना, आँख में लालिमा होना, छींके आना नाक से पानी बहना इत्यादि।
रोग बढ़ाने वाले कारक
नैनो होम्योपैथी के चिकित्सको के अनुसार एलर्जी का कारण अभी तक अज्ञात है, परन्तु नीचे दी गई स्थितियाँ रोग की तीव्रता और अधिक बढ़ा देती हैं। जैसेः-
1.   पर्यावरण प्रदूषण- इससे शरीर की श्लेष्मा झिल्ली की पारग्मयता बढ़ जाती है। जिसके कारण एलर्जी कारक आसानी से शरीर के अन्दर प्रवेश कर जाते हैं।
2.   गले का संक्रमण।
3.   वायरल संक्रमण।
4.   अत्यधिक धूम्रपान।   
5.   एलर्जी कारक (परागकण धुआँ, धूल, रूसी, कवक, बीजाणु, सुगंधित पदार्थ) के सम्पर्क में आना।
6.   बचपन में माँ का दूध मिलना।


एलर्जी के मुख्य प्रकार
1.  दमा (Asthma)- इसके लक्षण सांस फूलना, खांसी बलगम, सीने मे जकड़न आदि होते हैं। कभी-कभी ये लक्षण इतनी तीव्रता हो जाते है कि रोगी को श्वासहीनता का द्रौरा पड़ सकता है, और यदि तुरन्त चिकित्सा मिले तो रोगी का जीवन खतरे में पड़ सकता है।
2.    एलर्जिक राइनाइटिस (Allergic Rhinitis)- इस रोग में आँख नाक में खुजली के साथ पानी बहना, अत्यधिक छींके, सिरदर्द भारीपन आदि लक्षण प्रकट होते हैं। इस रोग का मुख्य कारण परागकण, धुआँ, धूल सुगंधित पदार्थ कवक बीजाणु आदि होते हैं।
3.   पित्ती (Urticaria)- इसमें अचानक शरीर पर लाल चकत्ते उभरते हैं जिनमें जलन खुजली होती है।यह सामान्यतः मौसम परिवर्तन के साथ बढ़ता है।
4.   एलर्जिक कनजक्टिवाइटिस (Allergic Conjunctivitis)- जब एलर्जी कारक आँख के सम्पर्क में आता है तो आँख में लालिमा जलन खुजली होती है और कभी-कभी सूजन दर्द भी हो सकता है।
निदान
रोग के लक्षणों के आधार पर कुछ निश्चित एलर्जी कारकों का चुनाव किया जाता है। फिर इनको हाथ पीठ की त्वचा के नीचे सूई द्वारा प्रवेश कराते हैं। तत्पश्चात जो लाल निशान उभरते हैं उनके आधार पर किस से एलर्जी है और किससे नहीं, को पहचाना जाता है इसे Allergy Test  के नाम से जाना जाता है
उपचार
1.   जिन पदार्थों से एलर्जी होती है उसकी वैक्सिन को त्वचा के नीचे सूई द्वारा प्रवेश कराया जाता है। और इस क्रिया को निश्चित अंतराल पर कई बार दोहराया जाता है। इस प्रकIर का वैक्सिनेशन अधिक कष्टप्रद तो होता ही है साथ ही रोगी को पूर्णतः लाभ भी नहीं होता है।

2.   प्रचलित चिकित्सा पद्धति में एलर्जी रोधक दवाएँ देकर रोगी की समस्या को कम किया जाता है तथा दमे के रोगी को इनहेलर्स नेबूलाइजर् दिया जाता है। जो श्वांस नली को फैला देते है जिससे सांस लेने में मदद मिलती है। यह स्थायी समाधान नहीं है अपितु क्षणिक लाभ अवश्य देता है।

सावधानियाँ
1.   धुएँ-धूल से बचें।
2.   शीतल पेय पदार्थ प्रतिशीतित भोजन के प्रयोग से बचें।
3.   शैशव काल में स्तन-पान को वरीयता दें।
4.   सिन्थेटिक वस्तुओं के प्रयोग से बचें।
5.   संक्रमण से बचें एवं एलर्जी कारक की पहचान कर उससे दूर रहें।
6.   अचानक तापमान परिवर्तन से बचें।

होम्योपैथिक उपचार
होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली में, प्रतिरक्षा तंत्र की एलर्जीकारक के विरुद्ध प्रतिक्रिया को पूर्ण रूप से पंगु कर, उसकी अतिक्रियाशीलता (Hyperactivity) को कम किया जाता है, जिससे क्रिया एवं प्रतिक्रिया में एक सामंजस्य बना रहता है तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी क्षीण नहीं होती है। इससे रोगी इलाज के उपरान्त पूर्णतया आरोग्य हो जाता है। इस दौरान रोगी होम्योपैथिक दवाओं के साथ किसी अन्य बीमारी के लिए आपातकालीन दवाओं का भी सेवन कर सकता है।
एलर्जी के होम्योपैथिक उपचार के दौरान रोगी द्वारा इसके लिए पूर्व में ली जा रही अन्य दवायें (इनहेलर्स, खाने की दवायें) शनैः शनैः कम करते हुए अंततः बन्द करा दी जाती हैं तथा रोगी की दवाओं पर आजीवन निर्भरता समाप्त हो जाती है, एवं रोगी पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है। इसमें मुख्य रूप से लक्षणानुसार होम्योपैथिक औषधियाँ जैसे- एकोनाइट, बेलाडोना, एलियम सीपा, साबाडिला, हीपर-सल्फ, आर्सेनिक-एल्ब, सेंग्युनेरिया, यूफ्रेशिया, काली कार्ब, ब्लाटा, ब्रायोनिया, पोथोस, केल्केरिया-कार्ब, रस टाक्स, अमोनियम कार्ब, साइलेशिया लाभकारी हैं जिन्हें किसी कुशल होम्योपैथिक चिकित्सक से परामर्श कर लिया जा सकता है।

Other than kidney failure patients who should take Homeopathic treatment for Kidney? 1. Healthy persons, who have strong family histo...